आइये सबसे पहले हम ‘ज्योतिष’ शब्द को परिभाषित करते हैं। यह शब्द मूल रूप से “द्युत” धातु से व्युत्पन्न है। इस धातु की परिभाषा है “द्युत – दीप्तौ” अर्थात् प्रकाश। (अकर्म, सेट्, आत्मने)
‘द्युत’ धातु से व्युत्पन्न हुआ ‘ज्योतिस्’ [ ‘द्योतते द्युत्यते वा’ : जो स्वयं प्रकाशित हो और प्रकाशित करे। ‘द्युत+इसुन् दस्य जादेशः’ के अनुसार ‘द्य’ का ‘ज्य’ हो गया ] अब प्रकाश का गुण क्या है? अन्धकार दूर करना। हम यह सिद्धान्त भली-भाँती जानते हैं कि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अन्धकार है, तो ‘ज्योतिस्’ शब्द का भावार्थ बना “अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाला प्रकाश” ।
इस ‘ज्योतिस्’ शब्द का विशेषण (विशेषता वताने वाला) स्वरूप-शब्द हुआ ‘ज्योतिष’।
ज्योतिष को वेदांग कहा गया है । ‘ज्योतिष: वेदाणां चक्षु:’ अर्थात् ‘ज्योतिष वेदों का नेत्र है’। नेत्र का गुण है देखने की और दिखा सकने क्षमता वाला अंग । इस प्रकार ज्योतिष को वेदों का ऐसा अंग कहा गया जो ‘देख सकता है, और दिखा भी सकता है’ । यह भी सर्वविदित है की जो देख सकेगा, वही जान भी सकेगा और जो दिखा सकेगा, वही सम्यक रूप से जानकारी भी दे सकेगा। अब प्रश्न उठता है कि क्या देख सकना और क्या दिखा सकना? इसका उत्तर हुआ ‘ईश्वरीय ज्ञान, काल गति और सृष्टि-स्थिति-संहार का समाहार’ ।
इस प्रकार ज्योतिष स्वयं प्रकाश (या ज्ञान) भी है, प्रकाशित करने वाला भी और प्रकाशित होने वाला भी और साथ ही यह उस प्रकाश को देख सकने वाला और दिखा सकने वाला भी है जो अपने इन गुणों को धारण करता हुआ वेदों का ही एक अंग है।
दृष्टान्त के अनुसार ‘ज्योतिष होने’ का अर्थ है ‘सूर्य होना’। स्वयं में अग्निविद्या का संधान करके, स्वयं को मानो जला कर, तपा कर, साध कर सबको प्रकाश और प्राण देना। बाह्य और अन्तर्ब्रह्माण्ड के तिमिर को, अन्धकार को, पापराशि को जलाने की क्रिया, यही ‘ज्योतिष होना’ का गूढ़ार्थ है।
... और इस गूढ़ार्थ को जान लेना ही सिद्धि है।
‘द्युत’ धातु से व्युत्पन्न हुआ ‘ज्योतिस्’ [ ‘द्योतते द्युत्यते वा’ : जो स्वयं प्रकाशित हो और प्रकाशित करे। ‘द्युत+इसुन् दस्य जादेशः’ के अनुसार ‘द्य’ का ‘ज्य’ हो गया ] अब प्रकाश का गुण क्या है? अन्धकार दूर करना। हम यह सिद्धान्त भली-भाँती जानते हैं कि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अन्धकार है, तो ‘ज्योतिस्’ शब्द का भावार्थ बना “अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाला प्रकाश” ।
इस ‘ज्योतिस्’ शब्द का विशेषण (विशेषता वताने वाला) स्वरूप-शब्द हुआ ‘ज्योतिष’।
ज्योतिस् + अच् (प्रत्यय) = ज्योतिष
ज्योतिष को वेदांग कहा गया है । ‘ज्योतिष: वेदाणां चक्षु:’ अर्थात् ‘ज्योतिष वेदों का नेत्र है’। नेत्र का गुण है देखने की और दिखा सकने क्षमता वाला अंग । इस प्रकार ज्योतिष को वेदों का ऐसा अंग कहा गया जो ‘देख सकता है, और दिखा भी सकता है’ । यह भी सर्वविदित है की जो देख सकेगा, वही जान भी सकेगा और जो दिखा सकेगा, वही सम्यक रूप से जानकारी भी दे सकेगा। अब प्रश्न उठता है कि क्या देख सकना और क्या दिखा सकना? इसका उत्तर हुआ ‘ईश्वरीय ज्ञान, काल गति और सृष्टि-स्थिति-संहार का समाहार’ ।
इस प्रकार ज्योतिष स्वयं प्रकाश (या ज्ञान) भी है, प्रकाशित करने वाला भी और प्रकाशित होने वाला भी और साथ ही यह उस प्रकाश को देख सकने वाला और दिखा सकने वाला भी है जो अपने इन गुणों को धारण करता हुआ वेदों का ही एक अंग है।
दृष्टान्त के अनुसार ‘ज्योतिष होने’ का अर्थ है ‘सूर्य होना’। स्वयं में अग्निविद्या का संधान करके, स्वयं को मानो जला कर, तपा कर, साध कर सबको प्रकाश और प्राण देना। बाह्य और अन्तर्ब्रह्माण्ड के तिमिर को, अन्धकार को, पापराशि को जलाने की क्रिया, यही ‘ज्योतिष होना’ का गूढ़ार्थ है।
... और इस गूढ़ार्थ को जान लेना ही सिद्धि है।

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